संघर्ष की कहानी | a story related to you










 


एक तालाब था । उस तालाब में बहुत सारे मेंढक रहते थे । उस तालाब के पास ही एक खंभा था । एक दिन तालाब के सारे मेंढकों ने सोचा कि – क्यों ना एक प्रतियोगिता रखी जाए । कि इस खंभे पर जो सबसे पहले चढ़ेगा वही हमारा विजेता होगा । और उसे इनाम दिया जाएगा । तालाब के सभी मेंढकों में यह प्रतियोगिता शुरू हो गई । आसपास के और भी मेंढक इस प्रतियोगिता को देखने आए । सभी मेंढक उस खंभे पर चढ़ने का प्रयास करने लगे । जैसे ही मेंढक उस खंभे पर चढ़ रहे थे , वे बार-बार फिसल कर नीचे गिर जाते । लेकिन दोबारा चढ़ते , फिर नीचे गिर जाते । बहुत से मेंढक ऐसे थे जो हार मानकर एक किनारे बैठ गए और कहने लगे कि नहीं , यह तो असंभव है । इस खंभे पर कोई नहीं चढ़ सकता , क्योंकि यह खंबा बहुत ही चिकना है । कुछ मेंढक अब भी प्रयास कर रहे थें,  परंतु कुछ दूरी पर ही चढ़े थे कि फिर फिसल कर नीचे आ गए । किनारे पर बैठे हुए मेंढक चिल्ला रहे थे कि – अरे यह नहीं होगा , वापस आ जाओ । ऐसा कहकर वे उनकी आशा को तोड़ रहे थे ।  तभी सारे मेंढकों ने हार मान ली । लेकिन एक छोटा सा मेंढक अभी चढ़ ही रहा था । बार-बार गिरता था , फिर चढ़ता था । फिर गिरता था , फिर चढ़ता था । उसे भी सारे मेंढक पीछे से कह रहे थे कि – अरे नहीं , तुम इस खंभे पर चढ़ ही नहीं सकते , वापिस आ जाओ । इस खंभे पर कोई नहीं चढ़ सकता । लेकिन वह छोटा सा मेंढक किसी की बात सुन ही नहीं रहा था और वह चढ़ता गया ,फिर गिरता गया । इस तरह वह अपने प्रयास से धीरे-धीरे उस खंभे के ऊंचाई पर पहुंच गया और वहां पर चढ़कर बैठ गया । ऐसा देख सारे जो मेंढक थे , सब हैरान हो गए और कहने लगे कि ये तुमने किस तरह कर दिया ? तुम किस तरह  इतनी ऊंचाई पर चढ़ गए । हमसे तो यह काम हो ही नहीं रहा था । तब उनमें से एक जो बूढा मेंढक था । वह बोला कि अरे ! इससे क्या पूछ रहे हो , यह मेंढक तो बहरा है ।

 तो दोस्तों , इस कहानी से यही सीख मिलती है कि यदि जीवन में सफलता पानी है , तो हमें दुनिया वालों की बात पर ध्यान न देकर सिर्फ अपने काम को करने का जज्बा रखना चाहिए । हो सकता है कि हम एक या दो बार उसमें असफल हो जाए , लेकिन एक ना एक दिन हमारी मेहनत जरूर सफल होगी ।


There was a pond. Many frogs lived in that pond. There was a pillar near that pond. One day all the frogs in the pond thought that why not have a competition. That the one who climbs this pole first will be our winner. And he will be rewarded. This competition started among all the frogs in the pond. Other frogs from around also came to watch this competition. All the frogs started trying to climb that pole. As the frogs were climbing that pole, they would repeatedly slip and fall down. But would climb again, then fall down again. There were many frogs who accepted defeat and sat on one side and said no, this is impossible. No one can climb this pillar, because this pillar is very smooth. Some frogs were still trying, but had climbed only a short distance and then slipped and came down. The frogs sitting on the bank were shouting that - Oh this will not happen, come back. By saying this, he was breaking their hope. Only then all the frogs accepted defeat. But a small frog was still climbing. Used to fall again and again, then used to climb. Then used to fall, then used to rise. All the frogs were also telling him from behind that – oh no, you cannot climb this pole at all, come back. No one can climb this pillar. But that little frog was not listening to anyone and he kept climbing, then kept falling. In this way, with his efforts, he slowly reached the height of that pillar and climbed there and sat down. Seeing this, all the frogs were surprised and asked how did you do this? How did you climb so high? We were not able to do this work at all. Then one of them who was an old frog. He said hey! What are you asking him, this frog is deaf.

 So friends, this story teaches us that if there is success in life, then we should have the spirit of doing our work only by not paying attention to the people of the world. We may fail in it once or twice, but one day our hard work will definitely be successful.

मां का कर्ज। एक कहानी | A true story of every home













 

बेटा  मां  से –  मां , क्या आप रोज –रोज कहती हो कि तू मेरा कर्ज नहीं उतार सकता ।  लो आज मैं तुम्हारा सारा कर्ज उतारना चाहता हूं । बताओ , उसके लिए मुझे क्या करना होगा । 

 मां – अच्छा बेटा , अब तू इतना बड़ा हो गया है कि तू मेरा कर्ज उतारना चाहता है । 

 बेटा –  हां मां , मैं आज तुम्हारा सारा कर्ज उतारना चाहता हूं । मैं फिर दोबारा ये बात सुनना नहीं चाहता कि तू मेरा कर्ज नहीं उतार सकता । 

 मां – ठीक है बेटा , तुझे उसके लिए एक रात आज मेरे पास ही सोना होगा । 

 बेटा –  बस इतनी सी बात , अगर मैं आपके पास एक रात सो जाऊं तो क्या आपका सारा कर्ज उतर जाएगा ? 

 मां – हां बेटा ,

 बेटा – ठीक है मां, आज रात मैं आपके पास ही सोऊंगा ।

      बेटा अपनी मां के पास ही सो जाता है । अभी उसे थोड़ी देर ही सोए हुए को हुई थी कि मां ने आवाज लगाई ।

मां – बेटा ,  उठ तो । मुझे बहुत प्यास लगी है ।

बेटा – मां ,वही आपके पास मेज पर पानी रखा हुआ है , आप पी लीजिए , मुझे नींद आ रही है ।

मां – बेटा , तू मेरा कर्ज उतारना चाहता है ना ? तो फिर .....  मुझे उठकर पानी पिला । 

बेटा कुछ सोचकर उठता है और एक गिलास भरकर मां को पानी का देता है । जिस तरफ बेटा सोया हुआ था मां उस पानी के गिलास को गलती से उधर गिरा देती है ।

बेटा – अरे मां ! यह क्या किया आपने ? मेरे बिस्तर को  गीला कर दिया । अब मैं कैसे सोऊंगा ? 

मां – गलती से गिर गया बेटा । बूढ़ी हो गई हूं ना..... अब हाथ कांपते हैं । तू इस पर कोई दूसरी चादर बिछा ले और सो जा ।

बेटा दूसरी चादर उस पर बिछा लेता है और वही सो जाता है । उसे फिर से नींद आई ही होती है कि मां फिर आवाज लगाती है ।

मां – बेटा , उठ तो । मुझे बहुत जोर से पेशाब आ रहा है जरा मेरे साथ चल । कहीं मैं अंधेरे में गिर ना जाऊं ?  

      बेटे को गुस्सा आता है और मन में सोचता है कि – बस आज रात की बात है , किसी तरह आज रात मां के पास सो कर इसका कर्ज उतार दूं । फिर कल से तो मैं आराम से सोऊंगा । यह सोचकर वह उठ जाता है और अपनी बूढ़ी मां को पेशाब करा कर ले आता है । और आकर दोनों मां बेटे सो जाते हैं । बेटे को फिर से अभी नींद ही आई थी कि मां  ने फिर से आवाज लगाई ।

 मां – बेटा, उठ तो । मेरे सिर में बहुत दर्द हो रहा है । मुझे कोई सिर दर्द की दवाई दे दे । 

 बेटा झल्लाकर– क्या मा ? आप मुझे बार-बार परेशान कर रही हैं । अभी थोड़ी देर पहले तो उठा था । जब आप नहीं कह सकती थी कि मुझे सिर में दर्द हो रहा है और दवाई दे दो । अभी मुझे नींद ही आई थी । एक तो आपने पहले से बिस्तर गीला कर रखा है ।

 बेटा फिर से मन में कर्ज वाली बात सोचता है और उठकर दवाई देता है और साथ में पानी का गिलास देता है ।

 मां दोबारा उस पानी के गिलास को उसके बिस्तर पर गिरा देती है ।

 बेटा गुस्से से चिल्लाते हुए  – यह क्या किया मां आपने ? फिर से मेरा बिस्तर गीला कर दिया । अब मैं यहां पर कैसे सोऊंगा ? मैंने तो गलती कर दी आपके पास सोकर ।  आप मुझे चैन से सोने ही नहीं दे रही हो । बार बार मुझे जगा कर मेरी नींद खराब कर रही हो ।

 मां – अच्छा बेटा । मैंने तुझे दो या तीन बार क्या उठाया , तुझे गुस्सा आ गया । तेरी नींद खराब हो गई और जो तेरे बचपन में मैंने कई रातें जाग जाग कर तेरे साथ बिताई हैं , उनका क्या.......?  जब तू अपने मल मूत्र से बिस्तर को गीला करता था । तो सूखे में तुझे सुलाती थी और उस मल मूत्र और गीले बिस्तर पर मैं खुद सोती थी । जब तो मेरी नींद नहीं खराब हुई । जब कभी तुझे बुखार आ जाता था तो सारी रात बैठ कर तेरी देखभाल करती थी । तेरी दवाई का ध्यान रखती थी और अब जब मुझे सिर दर्द हो रहा है , तो तेरी नींद खराब हो रही है । अगर तुझे मेरा कर्ज उतारना है तो तुझे उन सारी रातों का हिसाब देना होगा , जो 

 मैंने तेरे बचपन में तेरे साथ जागकर काटी है और अभी तो एक रात भी पूरी नहीं हुई है ।

 इन सब बातों को सुनकर बेटा अपनी मां के चरणों में गिर जाता है । और कहता है मां मुझे माफ कर दो , जो मैं आप का कर्ज उतारने चला था । मैं मूर्ख था जो यह समझ ही नहीं पाया कि कोई भी बेटा अपनी मां का कर्ज नहीं उतार सकता । 

 तो दोस्तों, बच्चे अपने मां  बाप का कर्ज कभी नहीं उतार सकते । लेकिन उनकी सेवा करके उस कर्ज को कुछ कम जरूर कर सकते हैं । मां बाप भगवान का रुप होते हैं । मां बाप की सेवा ईश्वर की सेवा मानी गई है । यदि हम अपने मां-बाप को खुश रखते हैं , तो ईश्वर हमसे अपने आप ही प्रसन्न रहते हैं ।


एक सच्ची घटना जब भगवान भक्त से बोले उठो , मुझे पुजारी ने जहर दे दिया है। kank dhara mandir ki khani












 

एक बहुत ही बड़े तपस्वी थे । वह श्री राम जी को अपना छोटा भाई और अपने आप को उनका बड़ा भाई मानते थे । वे श्रीराम जी से कहते थे कि मैं आपका बड़ा भाई हूं और अगर आपको कुछ भी काम हो तो मुझसे अवश्य कहिए । वे श्री राम मंदिर से थोड़ी दूर कुटिया बनाकर रहते थे । एक बार श्री राम मन्दिर के जो पुजारी थे , उनके बेटे को कोई बीमारी हो गई । उसके इलाज के लिए पुजारी जी एक वैद्य पर गए । उस वैद्य ने पुजारी को नीला थोथा नाम की दवाई दी । और उससे कहा की आप इसमे कुछ अन्य जड़ी बूटियां मिलाकर अपने पुत्र के शरीर पर लगा देना वो ठीक हो जाएगा । कहते है कि नीला थोथा एक विष के समान पदार्थ होता है ।  पुजारी ने नीला थोथा गलती से उस स्थान पर रख दिया , जहां पर वह भगवान के लिए मिश्री रखता था । पुजारी जी रात को भगवान को दूध का भोग लगाने वाले थे , तो उन्होने जल्दबाजी में दूध में मिश्री की बजाए नीला थोथा उठाकर घोल दिया और उन्होंने यह भी नहीं देखा कि दूध का रंग धीरे धीरे काला हो चुका है ।  उन्होने मन्दिर में श्री राम के आगे उसका भोग लगाकर  दरवाजा बंद कर दिया और जाकर सो गए । जब श्रीराम ने उस दूध को पिया , तो पीते ही उनकी प्रतिमा का सारा रंग काला पड़ गया । श्रीराम के हृदय में जलन होने लगी । तब श्री राम ने उन तपस्वी के स्वप्न में जाकर कहा कि –  उठो मेरे छोटे भाई , उठो , मुझे पुजारी ने गलती से नीला थोथा दे दिया है। मुझे ह्रदय में जलन हो रही है । मेरी प्रतिमा का सारा रंग काला हो गया है । कुछ उपाय करो ,मुझे बहुत पीड़ा हो रही है । तब संत जी जागे और अपने शिष्य को उठाया और उन्हें अपने स्वपन की सारी बात बताई । वे सब श्री राम के मन्दिर में गए । उन्होंने मंदिर के पुजारी को जगाया और सारी घटना बताई । रात में ही मंदिर के बाहर भक्तों की भीड़ जमा हो गई ।  यह बात सारे में फैल गई थी कि श्री राम को पुजारी ने गलती से जहर पिला दिया है । पुजारी और संत जी ने जाकर मंदिर का दरवाजा खोला , तो देखा कि श्री राम की सारी प्रतिमा काली हो गई है । तब संत जी ने श्रीराम से पूछा कि – आपकी यह जलन कैसे कम होगी ?   कृपया कुछ उपाय बताइए । तब श्री राम जी बोले कि – यह जो थोड़ा सा दूध बचा हुआ है । अगर इसमें तुम सवा मन दूध और मिलाकर सब भक्तजन को बांटो , तो मेरी यह जलन कम हो जाएगी । पुजारी और संत जी ने बाहर आकर सभी भक्तों को यह बातें बताई , तो सभी भक्त उस जहर को पीने के लिए तैयार हो गए । तब संत जी ने सवा मन दूध मंगा कर उसमें वो बचा हुआ दूध मिलाया और  सभी भक्तजन में बांट दिया । वहां पर कम से कम हजारों की संख्या में भक्तजन की भीड़ जमा थी । जैसे-जैसे दूध  बांटा जा रहा था , ऐसे ही प्रतिमा का रंग सफेद होता जा रहा था । बाद में जब सारा दूध बंट गया और सारे भक्तजन अपने घर चले गए । तब संत जी मंदिर में आए और देखा कि श्री राम की प्रतिमा का सारा रंग सफेद हो चुका है । लेकिन उनकी हथेली पर थोड़ी सी कालीमा बाकी है । तब उन्होंने श्री राम से पूछा कि यह आपकी हथेली जो काली रह गई है, वह कैसे ठीक होगी । तब श्री राम ने कहा कि यह नहीं जाएगी । तब संत जी ने कहा – क्यों प्रभु ? सारा दूध तो बंट गया है । फिर आपकी हथेली का रंग सफेद क्यों नहीं हुआ । तब श्री राम बोले कि जिस कढ़ाई में तुमने दूध आपस मे मिलाया था , उस कढ़ाई में थोड़ा सा दूध लगा रह गया है । जिसके कारण यह हथेली काली रह गई है । तब  संत जी बोले कि –  प्रभु , उस कढ़ाई में लगा हुआ दूध मैं पी लेता हूं । तब श्री राम बोले कि – नहीं , बड़े भाई इसे रहने दो। यह एक घटना के तौर पर याद रहेगी कि मेरे भक्तों ने मेरे लिए क्या-क्या सहन किया ।

  यह एक सत्य घटना है । यह घटना अयोध्या में श्री कनक बिहारी मंदिर जी की है । कनक बिहारी मंदिर में आज भी श्री राम , माता सीता और अपने अनुज सहित विराजमान है । और उनकी हथेली आज भी काली है । और उस काली हथेली को ढकने के लिए उस पर मेहंदी लगाई जाती है ।


He was a great ascetic. He considered Shri Ram ji as his younger brother and himself as his elder brother. He used to tell Shriram ji that I am your elder brother and if you need anything, then do tell me. He used to live in a hut a little far away from Shri Ram Mandir. Once the son of the priest of the Shri Ram temple got sick. The priest went to a doctor for his treatment. That doctor gave medicine named Neela Thotha to the priest. And told him that you mix some other herbs in it and apply it on your son's body, he will be fine. It is said that Neela Thotha is a poison-like substance. The priest mistakenly kept the blue thota at the place where he used to keep sugar candy for the Lord. The priest was about to offer milk to God at night, so in a hurry, instead of sugar candy, he mixed blue powder in the milk and he did not even notice that the color of the milk has gradually turned black. He offered bhog in front of Shri Ram in the temple, closed the door and went to sleep. When Shriram drank that milk, the whole color of his statue turned black as soon as he drank it. Shriram's heart started feeling jealous. Then Shri Ram went in the dream of that ascetic and said – wake up my younger brother, wake up, the priest has given me blue thota by mistake. I am having heartburn. The whole color of my statue has turned black. Do some remedy, I am suffering a lot. Then the saint woke up and woke up his disciple and told him all about his dream. They all went to the temple of Shri Ram. He woke up the priest of the temple and told the whole incident. A crowd of devotees gathered outside the temple in the night itself. The word had spread all over that the priest had mistakenly given poison to Shri Ram. When the priest and the saint opened the door of the temple, they saw that the entire idol of Shri Ram had turned black. Then the saint asked Shriram that - how will this jealousy of yours be reduced? Please suggest some solutions. Then Shri Ram ji said that - this little milk is left. If you add one-fourth mind milk and distribute it to all the devotees, then this jealousy of mine will reduce. The priest and the saint came out and told these things to all the devotees, then all the devotees got ready to drink that poison. Then the saint asked for a quarter of a cup of milk, mixed the remaining milk in it and distributed it among all the devotees. There was a crowd of at least thousands of devotees gathered there. As the milk was being distributed, the color of the idol was becoming white. Later, when all the milk was distributed and all the devotees went to their homes. Then the saint came to the temple and saw that the entire color of the idol of Shri Ram had turned white. But there is a little Kalima left on his palm. Then he asked Shri Ram that how will this blackened palm of yours be cured. Then Shri Ram said that it will not go. Then the saint said - Why Lord? All the milk has been distributed. Then why didn't the color of your palm turn white. Then Shri Ram said that the pan in which you had mixed the milk, a little milk has remained in that pan. Due to which this palm has remained black. Then the saint said - Lord, I drink the milk in that pan. Then Shri Ram said - No, elder brother leave it. It will be remembered as an incident that what my devotees tolerated for me.

  This is a true incident. This incident is of Shri Kanak Bihari Temple in Ayodhya. Even today Shri Ram, Mata Sita and his younger brother are sitting in the Kanak Bihari temple. And his palm is still black. And to cover that black palm, henna is applied on it.

कैसे बनी जामवंती रीछ से लड़की | श्री कृष्ण की पत्नी जामवंती की कहानी



 












एक बार श्री कृष्ण भगवान और जामवंत जी के बीच भयानक युद्ध हुआ । युद्ध में जामवंत जी परास्त हो गए । तब जामवंत जी बोले कि – आप कौन हैं ? मुझे तो इस धरती पर केवल प्रभु श्रीराम ही परास्त कर सकते थे । और आप तो श्री राम नही है। फिर आप कौन हैं ? तब श्री कृष्ण ने अपने श्री राम रूप के दर्शन जामवंत जी को कराए । और कहा कि – जामवंत , मैंने ही अब श्री कृष्ण रूप में अवतार लिया है । तब जामवंत जी बहुत ही खुश हुए और उन्होंने प्रभु को स्यामंतक मणि लौटा दी । तब जामवंत जी बोले कि – प्रभु , मेरी आपसे एक विनती है । त्रेता युग में मैंने अपनी पुत्री के विवाह के लिए आपको कहा था । परंतु तब आपने कहा कि –  मैं एक पत्नी व्रत धारण कर चुका हूं । इसलिए मैं इस जन्म में एक से अधिक विवाह नहीं करूंगा । तब आपने मुझे कहा था कि – जब मैं श्री कृष्ण रुप में आऊंगा । तब तुम्हारी पुत्री से विवाह करूंगा । इसलिए हे कृपा निधि,  आप मेरी जामवंती पुत्री से विवाह कीजिए । तब श्री कृष्ण भगवान ने अपने वचन अनुसार जामवंत की पुत्री जामवंती से विवाह किया । जामवंती बिल्कुल जामवंत के जैसी थी क्योंकि वह एक रीछ जाति से संबंध रखती थी । उसका रूप रंग आकार सब एक रीछनी की भांति ही था । परंतु कृष्ण भगवान ने अपने वचन के अनुसार उस से विवाह किया और उसे द्वारिका ले आए । श्री कृष्ण भगवान ने रास्ते में जामवंती से कहा कि – जब तक मैं ना कहूं , तब तक तुम ना तो अपना घूघंट हटाओगी और ना ही कुछ बोलोंगी । द्वारिका पहुंचकर रुकमणी जी ने कृष्ण भगवान की आरती उतारी । और पूछा कि – प्रभु , ये आपके साथ कौन है ? इसने इतना लंबा घुंघट क्यों ओढ़ रखा है ? और यह सिर से पांव तक इस तरह कपड़ों से क्यों ढकी हुई है कि इसके पैर का एक नाखून भी दिखाई नहीं दे रहा है । तब श्री कृष्ण ने कहा कि ये जामवंती है और मैंने इससे विवाह किया है । यह बहुत ही सुंदर है और अपना रूप किसी को दिखाना नहीं चाहती । तब रुकमणी जी ने उसका घूंघट उठाने का प्रयास किया क्योंकि वे उसका चेहरा देखना चाहती थी । किंतु जामवंती ने अपने घूंघट को कसकर पकड़ रखा था ।  रुकमणी जी उसके घूंघट को उठाने का प्रयास कर रही थी क्योंकि वे उसका मुख देखना चाहती थी । परंतु जामवंती ने अपना घुंघट नहीं उठाने दिया । ऐसा होते देख रुकमणी जी को क्रोध आ गया और उन्होंने जामवंती को श्राप दिया कि – " तुम्हे अपने रुप रंग पर बहुत ही अभिमान है, तुम अपने आप को हमसे ज्यादा खुबसूरत समझती हो । इसलिए हमे अपना रुप नही दिखाना चाहती। जाओ , मैं तुम्हे श्राप देती हूं कि तुम रुप रंग में मेरे जैसी हो जाओ। "  रुकमणी के ऐसा कहते ही जामवंती का रीछनी रूप एक सुंदर सी नारी में बदल गया । तब श्री कृष्ण ने जामवंती का घूंघट हटवाया । जामवंती ने रुकमणी जी को हाथ जोड़कर प्रणाम किया । और बोली कि – दीदी , यदि मेरे व्यवहार से आपको कोई कष्ट हुआ हो तो मुझे अपनी छोटी बहन समझकर क्षमा करें । जामवंती के ऐसा कहते ही रुक्मणी जी का क्रोध शांत हो गया । उसके बाद जामवंती का द्वारिका में भव्य स्वागत हुआ ।









भगवान बोले ये मेरे वो भक्त है जिन्हे में भजता हूँ | God said, this is my devotee whom I worship









 


एक बार नारद ऋषि श्री राम जी से मिलने आए । उन्होंने द्वार पर हनुमान जी को देखा ।  हनुमान जी ने उन्हें प्रणाम किया । तब नारद जी बोले कि – हनुमान !  मैं प्रभु श्रीराम से मिलने आया हूं । प्रभु इस समय क्या कर रहे हैं । हनुमान जी बोले – भगवान श्री राम कुछ बही खाते का काम कर रहे है । तब नारद जी ने अंदर जाकर देखा कि भगवान श्री राम बही खाते में कुछ लिख रहे हैं । तब नारद जी बोले – प्रभू , आप इस काम के लिए किसी मुनीम को क्यों नहीं रख लेते ? तब श्री राम ने कहा कि – मैं अपना काम स्वयं करता हूं, मैं अपना काम किसी और को नहीं सौंप सकता । तब नारद जी बोले कि–  भगवन , इस बही खाते में आप किस का हिसाब किताब कर रहे हो । तब श्री राम बोले कि – इस  बही खाते में मेरे उन भक्तों के नाम है , जो मुझे दिन-रात भजते हैं । मैं उन भक्तों की प्रतिदिन हाजिरी लगाता हूं । तब नारद जी बोले कि – अच्छा प्रभु , बताइए मेरा नाम इस बही खाते में कहां पर है ?  तब नारद जी ने बही खाते को देखा तो उनका नाम सबसे ऊपर लिखा हुआ था । यह देखकर नारद जी को बहुत ही खुशी हुई और उन्हें अपने आप पर गर्व महसूस होने लगा । पर नारद जी ने देखा कि हनुमान जी का नाम तो उस बही खाते में कहीं पर भी नहीं था ।  उन्हें यह देखकर बहुत ही आश्चर्य हुआ । उन्होंने सोचा कि हनुमान जी तो राम जी के खास भक्त हैं । फिर प्रभु श्री राम उनका नाम लिखना कैसे भूल गए । यह बात उन्होंने आकर हनुमान जी को बताई ।  तब हनुमान जी बोले – नारद जी , शायद आपने बही खाते को ठीक से नहीं देखा होगा । मेरा नाम उस बही खाते में ही लिखा होगा । तब नारद जी बोले कि – नहीं हनुमान , तुम्हारा नाम उस बही खाते में कहीं पर भी नहीं था । तब हनुमान जी बोले –  अच्छा लगता है , प्रभु ने मुझे इस लायक ही नहीं समझा । कोई बात नहीं । फिर हनुमान जी बोले – मुझे लगता है कि प्रभु एक और बही खाता लिखते  हैं । शायद उसमें मेरा नाम होगा ।  तब नारदजी अंदर गए और श्रीराम से दोबारा पूछा कि भगवान सुना है कि आपके पास दूसरा बही खाता भी रखते हैं । जरा उसे दिखाना , उसमें क्या है ? तो भगवान ने कहा कि उसे देखकर तुम क्या करोगे । तब नारद जी के ज्यादा हठ करने पर प्रभु ने दूसरा बही खाता दिखाया , तो उसमें हनुमान जी का नाम सबसे ऊपर था।  तब नारद जी ने श्री राम जी से पूछा कि – भगवन ,  इसमें आप क्या लिखते हो ?  तब राम जी बोले कि – इसमें उन भक्तों के नाम है , जिन्हें मैं भजता हूं । जो भक्त मुझे जिह्वा से भजते हैं , वह मेरे भक्त हैं और जो भक्त मुझे ह्रदय से सिमरन करते हैं । उनका मैं स्वयं भक्त बन जाता हूं ।


God said, this is my devotee whom I worship


Once Narad Rishi came to meet Shri Ram. He saw Hanuman ji at the door. Hanuman ji bowed down to him. Then Narad ji said - Hanuman! I have come to meet Lord Shri Ram. What is the Lord doing at this time? Hanuman ji said - Lord Shri Ram is doing some book keeping work. Then Narad ji went inside and saw that Lord Shri Ram was writing something in the ledger. Then Narad ji said - Lord, why don't you hire an accountant for this work? Then Shri Ram said – I do my work myself, I cannot hand over my work to anyone else. Then Narad ji said that - God, whose account are you keeping in this ledger account. Then Shri Ram said that - In this account the names of those devotees of mine, who worship me day and night, are there. I mark the attendance of those devotees daily. Then Narad ji said - Good Lord, tell me where is my name in this account? Then when Narad ji saw the account book, his name was written at the top. Narad ji was very happy to see this and he started feeling proud of himself. But Narad ji saw that Hanuman ji's name was nowhere in that account. He was very surprised to see this. He thought that Hanuman ji is a special devotee of Ram ji. Then how did Lord Shri Ram forget to write his name. He came and told this thing to Hanuman ji. Then Hanuman ji said - Narad ji, perhaps you must not have seen the account book properly. My name must have been written in that account only. Then Narad ji said - No Hanuman, your name was not there anywhere in that account. Then Hanuman ji said - I feel good, God did not consider me worthy of this. No problem . Then Hanuman ji said - I think that God writes another account. Maybe my name will be there. Then Naradji went inside and again asked Shriram that God has heard that you keep another ledger as well. Just show it, what's in it? So God said what will you do after seeing him. Then on Narad ji's stubbornness, the Lord showed another ledger account, in which Hanuman ji's name was at the top. Then Narad ji asked Shri Ram ji - God, what do you write in this? Then Ram ji said that - it contains the names of those devotees whom I worship. The devotees who worship me with their tongue are my devotees and the devotees who worship me with their heart. I myself become his devotee.

Gyan Ganga | मार्गशीष महीने के कृषणपक्ष की उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा | Utpanna Ekadashi fast story of Krishna Paksha of Marshish month










 

हिंदू धर्म में मार्गशीर्ष महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी का बहुत महत्व है । इसे उत्पन्ना एकादशी भी कहा जाता है ।

कथा के अनुसार – 

सतयुग में मुर नाम का एक दैत्य था । वह बहुत ही भयानक और बलवान था । उसने इंद्र, वसु ,आदित्य ,वरुण ,अग्नि आदि सभी देवताओं को पराजित कर दिया था और उनके स्वर्ग लोक पर अपना आधिपत्य कर लिया था । सभी देवता डर के कारण भगवान शिव के पास गए और उन्हें सारा वृत्तांत सुनाया । तब भगवान शिव बोले कि – हे देवताआें !  तुम तीनों लोकों के स्वामी और भक्तों के दुख का नाश करने वाले भगवान विष्णु की शरण में जाओ । वे ही तुम्हारे दुखों को दूर करेंगे । इसके पश्चात सभी देवता क्षीर सागर में गए और कहा कि हे नारायण ! आप हमारी रक्षा करें । हमें दैत्यों ने पराजित करके स्वर्ग से भगा दिया है । कृपया हमारी रक्षा करें । हम सब आप की शरण में है । तब विष्णु भगवान बोले कि – हे देवताओं , ऐसा कौन सा मायावी असुर है जिसने तुम सभी देवताओं को पराजित कर दिया है । उसे किस का आश्रय है , वह कितना बलवान है । तब इंद्र देव बोले कि –  हे भगवन , प्राचीन काल में एक नाड़ीजंघ नाम का राक्षस था । उसका एक महापराक्रमी मुर नाम का एक पुत्र उत्पन्न हुआ । उसकी चंद्रावती नाम की नगरी है। उसी दैत्य ने हम सब देवताओं को परास्त करके स्वर्ग से निकाल दिया है । उसने अग्नि , वरुण ,यम  , कुबेर , आदित्य आदि सभी देवताओं के स्थान पर अपना आधिपत्य कर लिया है । स्वयं सूर्य बनकर प्रकाश देता है । स्वयं ही मेघ बन गया है और सबसे अजेय है । हे असुर निकंदन ! उस दुष्ट को मारकर हमारी रक्षा कीजिए ।

यह सब सुनकर विष्णु जी बोले कि –  हे देवताओं ! मैं शीघ्र ही उसका विनाश करूंगा । तुम चंद्रावती नगरी जाओ । इस प्रकार कहकर भगवान सहित सभी देवताओं ने चंद्रावती नगरी की ओर प्रस्थान किया। उस समय दैत्य मुर सेना सहित युद्ध भूमि में गरज रहा था । जब विष्णु भगवान युद्ध भूमि में आए , तो सारे दैत्य उन पर अस्त्र और शस्त्र लेकर दौड़े । लेकिन विष्णु भगवान ने अपने सर्प जैसे बाणों से उन दैत्यों को बींध दिया । सारे दैत्य मारे गए । केवल मुर बच गया था । वह अविचल भाव से भगवान के साथ युद्ध करता रहा । भगवान जो भी तीक्ष्ण बाण चलाते , वह उसके लिए पुष्प सिद्ध होते ।  उसका शरीर छिन्न-भिन्न हो गया था , लेकिन वह तब भी युद्ध करता रहा । भगवान ने उससे 10,000 वर्षों तक मल युद्ध किया । लेकिन मुर नहीं मारा गया । भगवान थक्कर बद्रिकाश्रम चले गए । वहां हेमवती नामक सुंदर गुफा थी । भगवान विश्राम करने के लिए उस गुफा के अंदर चले गए । वह गुफा 12 योजन लंबी थी और उसका एक ही द्वार था । विष्णु भगवान योगनिद्रा की गोद में सो गए । मुर भी उनके पीछे पीछे आ गया और उन्हें सोया देखकर उन्हें मारने को उद्धत हो गया । तभी भगवान के शरीर से उज्जवल कांति वाली एक देवी प्रकट हुई । देवी ने राक्षस मुर को ललकारा । उससे युद्ध किया और उसे तत्काल मौत के घाट उतार दिया । श्रीहरि जब योग निद्रा से उठे , तो सारी बात जानकर उन देवी से कहा कि –  तुम्हारा जन्म एकादशी के दिन हुआ है । अतः आप उत्पन्ना एकादशी के नाम से पूजित होंगी । आपके भक्त वही होंगे जो मेरे भक्त हैं ।


Ekadashi of the Krishna Paksha of the month of Margashirsha is very important in Hinduism. It is also called Utpanna Ekadashi.

According to legend –

In Satyuga there was a demon named Mur. He was terrible and strong. He had defeated all the gods like Indra, Vasu, Aditya, Varun, Agni etc. and had taken possession of their heaven. All the deities went to Lord Shiva out of fear and narrated the whole story to him. Then Lord Shiva said – O Gods! You go to the shelter of Lord Vishnu, the lord of the three worlds and the destroyer of the sorrows of the devotees. He alone will remove your sorrows. After this all the deities went to Ksheer Sagar and said O Narayan! you protect us The demons have defeated us and chased us away from heaven. please protect us We all are in your shelter. Then Lord Vishnu said – Oh Gods, what is this elusive Asura who has defeated all you Gods. Whose shelter does he have, how strong is he? Then Indra Dev said that - Oh God, in ancient times there was a demon named Nadijangha. A son named Mur was born to him. He has a city named Chandravati. The same demon has defeated all the gods and thrown us out of heaven. He has occupied the place of all the deities like Agni, Varuna, Yama, Kubera, Aditya etc. He himself gives light by becoming the Sun. He himself has become a cloud and is most invincible. O Asura Nikandan! Protect us by killing that evil.

Hearing all this, Vishnu ji said - O Gods! I will destroy him soon. You go to Chandravati city. Saying thus, all the deities including the Lord left for the city of Chandravati. At that time, the demon Mur was roaring in the battlefield along with the army. When Lord Vishnu came to the battlefield, all the demons ran on him with weapons and arms. But Lord Vishnu pierced those demons with his snake-like arrows. All the demons were killed. Only Mur was saved. He continued to fight with the Lord without any hesitation. Whatever sharp arrow God shot, it proved to be a flower for him. His body was dismembered, but he still continued to fight. God fought with him for 10,000 years. But Mur was not killed. Lord Thakkar went to Badrikashram. There was a beautiful cave named Hemvati. The Lord went inside that cave to take rest. That cave was 12 yojanas long and had only one door. Vishnu fell asleep in the lap of Lord Yoganidra. Mur also followed them and seeing them sleeping, got ready to kill them. Only then a goddess with bright radiance appeared from the body of the Lord. The goddess challenged the demon Mur. fought with him and killed him immediately. When Shri Hari woke up from Yog Nidra, after knowing the whole thing he said to that goddess – You were born on the day of Ekadashi. That's why you will be worshiped in the name of Utpanna Ekadashi. Your devotees will be those who are my devotees.