Gyan Ganga | कहानी पंढरपुर की सच्ची कहानी। यहाँ आज भी साक्षात् भगवान खड़े है। hINDI STORY

 
















पुराने समय की बात है । एक पुंडरीक नाम का एक व्यक्ति था । वह दांडीवन नामक एक स्थान पर अपने माता-पिता के साथ रहता था । वह अपने माता पिता की बहुत ही सेवा करता था । समय आने पर उसके माता-पिता ने एक अच्छी सी लड़की देख कर उसका विवाह कर दिया । विवाह के पश्चात पुंडरीक के व्यवहार में बहुत ही अंतर आ गया । वह अब सारा ध्यान अपनी पत्नी पर ही देता था । अपने माता पिता की सेवा नहीं करता था । पुंडरीक और उसकी पत्नी  माता – पिता को बहुत ही तंग करते थे । उनसे घर का सारा काम करवाते थे । एक दिन पुंडरीक के माता-पिता ने सोचा कि – अब हमारा यहां पर कुछ काम नहीं है । अब हमसे पुंडरीक के अत्याचार सहन नहीं होते , हमें काशी के लिए चल देना चाहिए । माता-पिता दोनों काशी के लिए पैदल चल दिए । रास्ते में उन्हें साधु संतों का एक काफिला मिला । वह काफिला भी काशी जा रहा था । बूढ़े मां-बाप उस काफिले में शामिल हो गए  । पुंडरीक की पत्नी ने कहा कि – देखो , तुम्हारे माता-पिता काशी यात्रा के लिए चले गए हैं । मुझे डर है कि तुम्हारे माता  – पिता सोने के जेवरात चुरा कर ले गए हैं और वे काशी जाकर उन्हें बेच ना दे । हमें भी उनके पीछे-पीछे जाना चाहिए । पुंडरीक और उसकी पत्नी भी घोड़े पर सवार होकर उनके पीछे –  पीछे काशी के लिए चल पड़े । रास्ते में उन्हें काशी जाने वाला काफिला मिला । उसमें ही उन्होंने अपने माता-पिता को देखा । जब रात्रि के समय काफिला रुकता , तो सब विश्राम करते थे । परंतु पुंडरीक अपने माता-पिता से घोड़ों की सेवा करवाता था । और उन्हें विश्राम नहीं करने देता था । उसके माता-पिता बहुत ही दुखी हो गए थे । वे सोचने लगे कि हम तो तीर्थ यात्रा के लिए निकले थे , लेकिन इसने हमारा पीछा यहां भी नहीं छोड़ा । जैसे ही रात्रि होती और काफिला रुकता , सब विश्राम करते  ।लेकिन पुंडरीक अपने माता-पिता से घोड़ों की सेवा और अन्य कार्य करवाता था । चलते – चलते काफिला  कुक्कुट स्वामी के आश्रम में पहुंचा । सब लंबी यात्रा करके थक गए थे । उन्होंने सोचा कि यहीं पर क्यों ना दो रात विश्राम कर लिया जाए । सब लोग रात्रि को सो गए । लेकिन पुंडरीक को नींद नहीं आई । वह सारी रात जागता रहा । आधी रात बीत चुकी थी । तब उसने देखा कि कुछ स्त्रियां पुराने मैले कपड़ों में आश्रम में प्रवेश करती है । आश्रम में जाकर उन्होंने साफ सफाई की । साधु-संतों के कपड़े धोएं  । पानी भर कर रखा और उसके बाद जब वे आश्रम से निकली तो उनके वस्त्र साफ –  सुथरे थे । आश्रम से थोड़ी दूरी पर ही  वे स्त्रियां गायब हो जाती थी । पुंडरीक को यह सब देखकर आश्चर्य हुआ । ऐसा ही अगली रात भी हुआ। पुंडरीक ने देखा कि वें स्त्रियां फिर मैले कपड़ों में आती है । साधु संतों की सेवा करती हैं । और जब आश्रम से निकलती है , तो उनके वस्त्र फिर से साफ-सुथरे होते थे । जब वे आश्रम से निकल रही थी तो पुंडरीक से रहा नही गया और उनसे पूछा कि – आप कौन है ? जब आप आई थी ,तो आप के वस्त्र बहुत ही मैले थें और अब आप आश्रम से जा रही हैं , तो आप के वस्त्र बहुत ही साफ हैं । इसका क्या कारण है ? उन्होंने बताया कि हम गंगा और यमुना आदि पवित्र नदियां है । जब तुम जैसे पापी हम में स्नान करते हैं , तो हमारे वस्त्र मैले हो जाते हैं और साधु संतों की सेवा करने से हमारे वस्त्र साफ हो जाते हैं । तुम भी बहुत ही बड़े पापी हो । क्योंकि तुमने अपने माता-पिता की सेवा नहीं की । और उन्हें इस यात्रा में भी बहुत कष्ट देते आए हो । उनकी बात सुनकर पुंडरीक को अपनी करनी पर पछतावा होने लगा । वह फिर से अपने माता-पिता का आज्ञाकारी पुत्र बनना चाहता था । इसलिए उसने जब अगली सुबह हुई , तो उसने अपने माता-पिता से हाथ जोड़कर क्षमा मांगी और कहा कि आप वापस मेरे साथ घर चलिए । मैं आपकी सेवा करके अपना जीवन सफल करना चाहता हूं । और उसने अपनी पत्नी को भी समझाया । दोनों पति पत्नी अपने माता-पिता को साथ लेकर चले । अब वह अपने माता-पिता की बहुत ही सेवा करता था । अपने माता-पिता को भोजन कराने के पश्चात ही दोनों पति-पत्नी भोजन ग्रहण करते थे । अब तो पुंडरीक की पत्नी भी अपने सास-ससुर के साथ अच्छा व्यवहार करती थी । एक दिन की बात है कि पुंडरीक अपने माता-पिता के चरण दबा रहा था कि तभी श्री कृष्ण भगवान माता रुक्मणी जी के साथ उसके घर के द्वार पर आए । और पुंडरीक का नाम लेकर उसे पुकारने लगे कि पुंडरीक  बाहर आओ । पुंडरीक ने पूछा कि आप कौन हो ? तब भगवान बोले कि – मैं भगवान श्री कृष्ण हूं जिसका तुम दिन रात नाम जपते हो । पुंडरीक ने कहा कि –  भगवान मुझे क्षमा करना , मैं अभी बाहर नहीं आ सकता । मैं अपने माता-पिता के चरण दबा रहा हूं । जब वें सो जाएंगे , तब मैं आपके पास आऊंगा । भगवान श्री कृष्ण खड़े-खड़े थक गए और उन्होंने पुंडरीक से पूछा कि –  कितना समय और लगेगा । जल्दी बाहर आओ । तब पुंडरीक बोला –  भगवान आपको अभी और प्रतीक्षा करनी होगी । श्री कृष्ण बोले –  अच्छा ठीक है , मुझे कुछ बैठने के लिए आसन दे दो । तब उसने भगवान के सामने एक ईट सरका कर कहा कि आप इस पर खड़े हो जाइए । भगवान बहुत देर से खड़े –  खड़े थक गए थे । इसलिए उन्होंने अपने दोनों हाथ कमर पर रख लिए और उस ईट पर दोनों पैर को जोड़कर खड़े हो गए । भगवान ये सब देखकर बहुत खुश हो रहे थे । जब पुंडरीक के माता-पिता को नींद आ गई  । तब पुंडरीक ने जाकर भगवान श्री कृष्ण का स्वागत किया । श्री कृष्ण ने कहा कि – पुंडरीक मैं तुम्हारी मातृ और पितृ भक्ति से बहुत ही प्रसन्न हूं । बताओ , तुम्हें क्या वर चाहिए । पुंडरीक ने कहा कि–  नहीं भगवन , मुझे आपके दर्शन हो गए , मुझे इसके अलावा और कुछ नहीं चाहिए । तब श्रीकृष्ण बोले कि – नहीं पुत्र ,  मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं और मैं तुम्हें एक वर देना चाहता हूं । मांगो तुम्हें क्या चाहिए ? तब पुंडरीक ने कहा कि –  भगवन ,  आप यहीं पर खड़े रहकर अपने भक्तजनों का उद्धार करें । तब भगवान श्री कृष्ण ने पुंडरीक और उसके माता-पिता को उसी समय मोक्ष प्रदान कर उन्हें अपने भगवत धाम भेज दिया ।  भगवान श्री कृष्ण का यही रुप श्री विग्रह के रूप में वहीं पर स्थापित हो गया । 

तो भक्तों, भगवान श्री कृष्ण अपने उस श्री विग्रह में विट्ठल  विठोबा कहलाए । विट्ठल भगवान एक शंकु के आकार का मुकुट पहने हुए हैं । उनके कानों में मछली के आकार की बालियां हैं । भगवान श्री विट्ठल देव जी का श्री विग्रह आज भी धरती पर उसी जगह स्थापित है । आज भी भगवान वहां एक ईंट पर खड़े है। पुंडरीक के नाम पर ही उस स्थान का नाम पंढरपुर पड़ गया ।

भक्तों , इससे हमें यही शिक्षा मिलती है कि माता पिता की सेवा भगवान की सेवा से भी बढ़कर है । जो लोग अपने माता – पिता की सेवा करते हैं , उनसे भगवान हमेशा प्रसन्न रहते हैं ।

It's old time. There was a man named Pundarik. He lived with his parents at a place called Dandivan. He served his parents a lot. When the time came, her parents saw a nice girl and got her married. There was a lot of difference in Pundarik's behavior after marriage. Now he used to give all the attention to his wife only. He did not serve his parents. Pundarik and his wife used to harass the parents very much. He used to make them do all the household chores. One day Pundarik's parents thought that now we have nothing to do here. Now we do not tolerate Pundarik's atrocities, we should leave for Kashi. Both the parents left on foot for Kashi. On the way he met a convoy of sages. That convoy was also going to Kashi. The old parents joined the convoy. Pundarik's wife said, "Look, your parents have gone to visit Kashi. I am afraid that your parents have stolen the gold jewelery and they will not go to Kashi and sell them. We should also go after them. Pundarik and his wife also rode on horse and followed them for Kashi. On the way they found a convoy going to Kashi. It was there that he saw his parents. When the convoy stopped at night, everyone used to rest. But Pundarik used to get his parents to take care of the horses. and did not allow them to rest. His parents were very sad. They started thinking that we had gone for pilgrimage, but it did not leave us here either. As night fell and the convoy stopped, everyone rested. While walking, the convoy reached the Poultry Swami's ashram. Everyone was tired from the long journey. He thought that why not take rest for two nights here. Everyone slept at night. But Pundarik could not sleep. He stayed awake all night. Half the night had passed . Then he saw some women entering the ashram in dirty old clothes. After going to the ashram, he cleaned. Wash the clothes of the saints. Filled it with water and after that when she came out of the ashram, her clothes were clean. Those women used to disappear only at a short distance from the ashram. Pundarik was surprised to see all this. The same happened the next night as well. Pundarik saw those women again come in dirty clothes. Sadhus serve the saints. And when she left the ashram, her clothes were clean again. When she was leaving the ashram, Pundarik could not stay and asked her – who are you? When you came, your clothes were very dirty and now you are leaving the ashram, your clothes are very clean. What is the reason for this ? He told that we are holy rivers like Ganga and Yamuna etc. When sinners like you bathe in us, our clothes become dirty and our clothes get cleaned by serving sages. You are also a great sinner. Because you did not serve your parents. And you have been giving them a lot of trouble in this journey too. Hearing his words, Pundarik started to regret his actions. He again wanted to be the obedient son of his parents. So when she came the next morning, she apologized to her parents with folded hands and asked you to come back home with me. I want to make my life successful by serving you. And he explained it to his wife also. Both husband and wife took their parents along with them. Now he used to serve his parents very much. Both husband and wife used to take food only after feeding their parents. Now even Pundarika's wife used to treat her mother-in-law well. It is a matter of one day that Pundarik was pressing the feet of his parents when Shri Krishna accompanied by Lord Mata Rukmani ji came to the door of his house. And taking the name of Pundarik started calling him that Pundarik should come out. Pundarik asked who are you? Then God said that - I am Lord Shri Krishna, whose name you chant day and night. Pundarik said that - God forgive me, I cannot come out now. I am pressing on the feet of my parents. I will come to you when he sleeps. Lord Shri Krishna got tired of standing and asked Pundarika – how much more time would it take. come out early Then Pundarik said - Lord you have to wait longer. Shri Krishna said – All right, give me some seat to sit. Then he moved a brick in front of God and said that you should stand on it. Bhagwan was tired of standing for a long time. So he put both his hands on the waist and stood on that brick with both feet folded. God was getting very happy seeing all this. When Pundarik's parents fell asleep. Then Pundarika went and welcomed Lord Krishna. Shri Krishna said that – Pundarik, I am very happy with your maternal and paternal devotion. Tell me, what do you want? Pundarik said – No God, I have seen you, I don't want anything other than this. Then Shri Krishna said - No son, I am very happy with you and I want to give you a boon. Ask what do you want? Then Pundarik said – Lord, you save your devotees by standing here. Then Lord Shri Krishna gave salvation to Pundarik and his parents at the same time and gave them salvation in their God.

I sent This form of Lord Shri Krishna was established there in the form of Shri Deity.

So devotees, Lord Shri Krishna in that Shri Deity is called Vitthal Vithoba. Lord Vitthal is wearing a cone shaped crown. He has fish-shaped earrings in his ears. The Shri Vigraha of Lord Shri Vitthal Dev ji is still established at the same place on earth. Even today God is standing there on a brick. The place was named Pandharpur after the name of Pundarik.

Devotees, this teaches us that service to parents is more important than service to God. God is always pleased with those who serve their parents.

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