राजस्थान के चूरू जिले में ददरेवा नमक एक गांव है , यही पर एक राजा हुवे जिनका नाम राजा जेवर सिंह था उनका विवहा बाछल से हुवा , उनके यहाँ किसी तरह की कोई कमी नहीं थी सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन विवाह के कई साल बीत गए लेकिन उनके यहाँ कोई संतान नहीं हुयी , इसलिए प्रजा और कुछ अन्य लोग चोरी छिपे राजा और उसकी रानी को देखना अपसकुन मानने लगे , धीरे धीरे ये बाटे रानी को भी पता लगी , राजा रानी बहुत दुखी हुवे , लेकिन उनके पास इसका कोई उपाय नहीं था ,
तभी उन्हें उनके मंत्रियो ने बताया की यहाँ पास में एक सिद्ध पंडित रहते है उनसे अगर आप इसका उपाय पूछ ले तो शायद आपको संतान हो सकती है , राजा रानी बड़े विनम्र भाव से उस पंडित के पास गए , वो पंडित कोई और नहीं बल्कि पंडित के भेष में स्वयं नारद जी थे जिन्हे इंद्र ने भेजा था ,
जैसे ही राजा ने अपनी समस्या बताई तो पंडित जी ने कहा की हे राजा अपने यहाँ दान पुण्य करो , और एक नौलखा बाग़ लगवाओ जिसमे 9 लाख तरह के अलग अलग पेड़ पौधे होंगे , उसकी अच्छी तरह से देख भाल करो , और जब इस बाग़ में फूल खिल, जाए तब तुम उस बाग़ के फूलो को भगवान को पूजा में चढ़ाना तो तुम्हे संतान हो सकती है , लेकिन सुनो राजा जब तक उस बाग़ मे पूर्णतया फूल ना खिल जाए तब तक तुम्हारी रानी को उस बाग़ को नहीं देखना है , तुम्हे ही उस बाग़ से फूल तोड़कर लाने है और उसके बाद राजा और रानी उन फूलो को शिव को चढ़ाओ तो तुम्हे संतान प्राप्ति होगी ,
राजा ने ऐसा ही किया ,राजा ने खूब दान पुण्य किया और नौलखा बाग़ लगवाया , उसकी अच्छी तरह देख भाल की और बाग़ कुछ ही सालो मे ऐसा हो गया की उसमे बहुत सरे फूल खिलने लगे और फूलो की खुसबू महल तक पहुंचने लगी , तभी रानी की बांदी उस बाग़ मे गई और कुछ फूल तोड़ अपनी टोकरी मे रख महल ले आई , रानी ने उन फूलो की खुसबू देखि तो उसने पूछा हे बांदी तुम ये फूल कहा से ले हो तभी बांदी ने बताया मे ये फूल नौलखा बाग़ जो राजा ने लगवाया था उस से लेकर आई हूँ ,
तब रानी की इच्छा भी हुयी की उस बाग़ को देखकर आया जाए लेकिन उन्हें पंडित की बात याद आती है की मुझे उस बाग़ को देखना नहीं है फिर भी रानी ने तय किया की मे आँखों पर पट्टी बांधकर राजा को बिना बताए उस बाग़ मे जाउंगी अगले दिन रानी ने अपनी बांदी को लिया और बाग़ मे पहुंचने से पहले ही अपनी बांदी से अपनी आँखों पर पट्टी बंधवा ली , रानी ने फूलो को छुवा उनकी महक बहुत जयादा मनमोहक थी , तो रानी से रहा ना गया और सोचा की यहाँ कोई देख नहीं रहा इसलिए पट्टी हटाकर चुपके से देख लेती हूँ , जैसे ही रानी ने पट्टी हटाई और फूलो और बाग की तरफ देखा बाग़ तुरंत मुर्जा गया और शाम तक देखते ही देखते अचानक से सूखने लगा ,
रानी को इस बात का बड़ा ही दुःख हुवा तो राजा से रट हुवे माफ़ी मांगी , और कहा की मुझे माफ़ कर दीजिए , इसके बाद रानी को एक उपाय सुझा की वंश खतम होने से अच्छा है मे अपनी बहन जिसका ना काछल था उसे राजा की दूसरी रानी के लिए अपने घर वालो से मांग लाती हूँ , रानी ने ऐसा ही किया सब मान गए , लेकिन जब काछल को पता लगा तो वो बहुत क्रोधित हुयी और कहा तुम अपने उस बूढ़े राजा के लिए मुझे मांग रही हो , लेकिन सबके मनाने पर उसने हामी भर दी और कहा मे तैयार हूँ लेकिन मेरा महल तुम्हारे महल से अलग बनेगा और तुम कभी मेरे महल मे नहीं आओगी , हो सकता है तुम्हारी परछाई ऐसी हो की मुझे भी संतान ना हो , रानी बाछल को बहुत दुःख हुवा पर वंश चलाने के लिए उसने हां बाहर दी ,
राजा का विवाह रानी की बहन काछल से हो गया , समय बीतता गया पर काछल के यहाँ भी कोई संतान नहीं हुई , अब पुरे घर मे दुःख और मायूसी छाई रहती क्योकि धन सम्पति तो बहुत है लेकिन उसे आगे बरतने वाला कोई नहीं ,
अब रानी ने भगवान शिव की पूजा शुरू की जिससे भगवान खुश हुवे और गुरु गोरखनाथ को अपने शिष्यों के साथ ददरेवा भेजा , जैसे ही गुरु गोरखनाथ ने बाग़ मे पैर रखा तो बाग़ मे जैसे चमत्कार हो गया जो बाग़ कई सालो से सूखा पड़ा था वो अचानक से हरा भरा हो गया , ये बता पुरे महल मे नगर मे फ़ैल गयी की वह पर कोई सिद्ध महात्मा आये है जिनके आने से सूखा बाग़ फिर से हरा हो गया , ये बात जब रानी को पता चली तो उनके मन मे एक बार फिर आशा की किरण जगी उन्होंने सोचा की अगर ऐसे महात्मा हमें संतान प्राप्ति का आशीर्वाद दे तो संतान हो सकती है ,
रानी ने अच्छे से अच्छा भोजन बनवाया और 7 थालो मे सजवाया , खूब सज धज कर रानी महात्मा गोरखनाथ को खाना देने पहुंची , तो गुरु गोरखनाथ को उनके शिष्यों ने बताया की रानी बाछल भोजन लेकर आयी है , गुरु गोरखनाथ अंतर्यामी थे उन्होंने कहा की हम उस स्त्री के यहाँ का भोजन नहीं खाएंगे जिसके यहाँ संतान ना हो ,रानी ने झूठ बोला की मे पुत्र की माँ हूँ तब गोरखनाथ जी ने कहा की इस जन्म तो क्या तुम साथ जन्मो की बाँझ हो तुम्हे संतान नहीं हो सकती तब रानी रोते हुवे गुरु गोरखनाथ के चरणों मे गिर कर रोते हुवे बोली महात्मा मे निसंतान हूँ इसमें मेरा क्या दोष मेने तो कभी किसी का बुरा नहीं किया , तब गुरु गोरखनाथ ने बताया की तुम पिछले जन्म मे एक किसान की बेटी थी तुम्हारे खेत मे एक टटीरी नमक पक्षी ने 7 अंडे दिए हुवे थे जिसे तुमने जान बूझकर तोड़ दिया तब टटीरी दुखी हुयी और माता के दुखी मन से भगवान से प्राथना की की इसके साथ भी ऐसा ही हो उसी के शाप के कारण तुम्हे साथ जन्मो तक संतान नहीं हो सकती ,
तब रानी ने रोते हुवे की महात्मा मुझे इसका कुछ उपाय बताए राजा और मे दुनिया वालो के ताने सुनकर दुखी हो गए है , या फिर हमे ऐसा शाप दे की हमारी मृत्यु हो जाए , गोरखनाथ का हृदय पसीजा और उन्होंने कहा की जो तुम भोजन लेकर आयी हो उसे इस तुम्बी मे डाल दो इस पर रानी ने कहा की महात्मा ये तुमभी बहुत छोटी है मे सात थाल भोजन लेकर आयी हूँ ये सारा भोजन इसमें नहीं आएगा ,
महात्मा ने कहा की अगर ये तुम्बी तुम्हारे भोजन से भर गयी तो मे तुम्हे आज ही संतान प्राप्ति का वरदान दूंगा लेकिन ध्यान रहे अगर ये नहीं भरी तो तुम्हे 12 वर्ष तक सेवा करनी होगी ,रानी ने अपने भोजन और तुम्बी को देखते हुवे हाँ कर दी और एक एक करके भोजन के थाल तुम्बी मे डालने लगी , साथ के साथ थाल खत्म हो गए परन्तु तुम्बी नहीं भरी , अब रानी को 12 वर्ष सेवा करनी थी , रानी ने सेवा करनी शुरू की , बीच बीच मे कई परीक्षाए ली गयी रानी सब मे सफल होती गयी आखिरकार 12 वर्ष पूरा होने मे एक दिन बचा था तो गुरु गोरखनाथ ने कहा की कल तुम सुबह सुबह जल्दी आना और अपना वरदान ले जाना ,
लेकिन यहाँ बात रानी की बहन काछल को पता चल गया उसने छल किया और रानी को बहलाफुसलाकर उससे एक दिन के लिए वो कपडे मांगे जिन्हे पहन रानी सेवा करने जाती थी , और सुबह समय से पहले ही महात्मा ने जहा धुनि रमाई थी वहा पहुंची , महात्मा ने सिर्फ कपडे देखकर काछल को एक फल दिया और कहा की जाओ दो पुत्र होंगे , ऐसा सुन काछल फल लेकर घर आ गयी ,लेकिन जब रानी बाछल जिसने सेवा की वो महात्मा के पास पहुंची तो महातम आने कहा की तुम तो सुबह ही वरदान दे दिया गया अब क्यों आई हो , रानी ने कहा महातम मे तो अभ आई हूँ मुझे आने मे देर इसलिए हुयी क्योकि मेरे सेवा के वस्त्र मेरी बहन मांग कर ले गयी थी महात्मा को समझते देर ना लगी ,
गोरखनाथ ने उन्हें सब कुछ बता दिया की ऐसे करके तुम्हारी बहन दो पुत्रो का वरदान ले गई , परन्तु तुम्हारी सेवा बेकार नहीं जाएगी , तुम शाम को आना , गुरुगोरखनाथ ने उन्हें शाम के समय दो गूगल को मिलकर दे दिया और कहा की जाओ तुम्हे तुम्हारी बहन से ज्यादा शक्तिशाली और चमत्कारी पुत्र होगा और वही तुम्हारी बहन के दोनों पुत्रो का वध भी करेगा , रनी ने कहा की महात्मा मेरे यहाँ पुत्र हो ये ठीक है लेकिन मे ऐसा पुत्र नहीं चाहती जो मेरी बहन के पुत्रो की हत्या करे , गोरखनाथ बोले मेरे कहा अटल है ,
इसके बाद रानी बाछल को एक पुत्र की प्राप्ति हुयी जिसका नाम गोगा जी रखा गया , और वही रानी की बहन के यहाँ 2 पुत्र हुवे जिनके नाम अर्जन और सर्जन था दोनों ददरेवा की गद्दी के हक़दार भी थे , इसके लिए गोगा जी और अर्जन -सर्जन मे युद्ध हुवा जिसमे अर्जन सर्जन दोनों मरे गए ,
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