जब स्वर्ग से आयी अप्सरा ने अपने पति को नग्न न देखने की शर्त , एक अनसुनी सी सच्ची कहानी ।

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हिन्दू धर्म में वेदों को पवित्र धर्म ग्रंथ और ज्ञान का स्तोत्र माना गया है ! हमारे कुल 4 वेद है ! जिनमे हमे कई ऐसी रोचक कथाओं का वर्णन मिलता है जिनसे हमे ज्ञान की कई बातें पता चलती है ! उन्ही वेदों में से एक ऋग्वेद की एक कथा हम आपके सामने लेकर आये है ! ऋग्वेद की इस बेहद ही रोचक कथा के अनुसार एक अप्सरा ने अपने ही पति से उसे नग्न न देखने का वचन लिया था ! क्यों लिया था इस अप्सरा ने अपने ही पति से ऐसा अनोखा वचन   ? और क्या थी वो पूरी कथा ? आइये हम आपको बताते है ! इस कथा के अनुसार स्वर्ग लोक में उर्वशी नाम की एक अप्सरा थी ! वो बहुत ही सूंदर थी ! वो देवों के राजा इन्द्र देव के दरबार में प्रत्येक संध्या नृत्य किया करती थी !
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 पर उसने कभी अपना हृदय किसी को भी अर्पित नहीं किया था ! एक बार की बात है वो अपनी सखी के साथ भू लोक पर विचरण कर रही थी ! तभी एक असुर की दृष्टि उर्वशी पर पड़ी ! उर्वशी के आलोकिक सौंदर्य को देखकर असुर मंत्रमुग्ध हो गया और उसने उर्वशी का अपहरण कर लिया ! वह उर्वशी को एक रथ में लिए चला जा रहा था कि उसी समय चंद्रवंशी राजा पुरुरवा वहां से गुजर रहे थे ! पुरुरवा बड़े ही वीर और पराक्रमी राजा थे ! उन्होंने उर्वशी की चीत्कार सुनी तो बिना किसी देरी के उन्होंने असुर पर आक्रमण कर दिया और क्षण भर में उस असुर को अपनी तलवार से मौत के घाट उतार दिया ! उधर उर्वशी राजा की वीरता और सौंदर्य को देखकर उन्हें अपना दिल दे बैठी ! यही हाल राजा पुरुरवा का भी था ! वो भी उर्वशी की सुंदरता को देखकर उससे मोहित हो चुके थे ! किन्तु पुरुरवा के कुछ कहने से पहले ही उर्वशी स्वर्ग लोक लौट गयी ! उर्वशी के स्वर्ग लौटने के बाद पुरुरवा उसके लिए बहुत बैचेन रहने लगे ! उधर स्वर्गलोक पहुंच कर भी उर्वशी का मन पृथ्वीलोक में लगा रहता ! इधर पुरुरवा को भी समझ नहीं आ रहा था कि वो करे तो क्या करे ? उसने अपने एक मित्र को ये व्यथा कह सुनाई !

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 एक दिन वे अपने उद्यान में अपने बचपन के मित्र राजविदूषक के साथ बैठे हुए थे और उनसे उर्वशी के संबंध में बातें कर रहे थे कि उर्वशी उनके पीछे आकर खड़ी हो गयी !  यद्यपि वह दिखाई नहीं दे रही थी उसने पुरुरवा को अपने उपस्थित होने का बोध करा दिया ! फिर दोनों परस्पर आलिंगन में बंध गए ! उसी समय स्वर्ग लोक से एक दूत आया और उसने उर्वशी को देवराज इन्द्र का संदेश सुनाया ! इन्द्र ने उसे आज्ञा दी थी कि वो तत्काल स्वर्ग लोक पहुंचकर एक विशेष नृत्य नाटिका में भाग ले ! लाचार होकर उर्वशी को लौट जाना पड़ा लेकिन उस दिन उर्वशी का मन नृत्यनाटिका में नहीं लग रहा था ! उस नृत्य में उर्वशी देवी लक्ष्मी का किरदार निभा रही थी ! एक सवांद में उसे भगवान विष्णु को पुकारना था ! परन्तु अनजाने में वो पुरुरवा को पुकार बैठी ! 
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ये देख नृत्य नाटिका के रचयिता भरतमुनि ने क्रोधित होकर तुरंत उसे श्राप दे दिया - '' तुमने मेरी नाटिका में चित्त नहीं रमाया ! तुम भू लोक जाकर वहाँ पुरुरवा के साथ मनुष्य की भांति ही रहो " ! उर्वशी और क्या चाहती थी ! वह पुरुरवा से प्रेम करने लगी थी ! यह सुनकर वो खुश हो गयी ! किन्तु वह अधिक दिनों तक मृत्युलोक में नहीं रहना चाहती थी ! अतएव देवराज इंद्र के पास पहुंचकर वह विनती करने लगी कि वह उसको श्राप मुक्त कर दे ! तब इंद्र ने कहा - हे उर्वशी ! तुम भूलोक जाओ किन्तु तुम अधिक दिनों तक वहां नहीं रहोगी ! अतएव उर्वशी को पुरुरवा के पास जाना पड़ा ! उर्वशी को राजा पुरुरवा के पास जाने की ख़ुशी तो थी किन्तु साथ ही स्वर्ग लोक के सारे आनंदों से वंचित होने का दुःख भी था ! पृथ्वी पर पहुंचकर उसने राजा पुरुरवा से कहा - राजन मैं तुम्हारे साथ रहूंगी , तुम्हारी दुल्हन बनूँगी , किन्तु मेरी कुछ शर्तें है ! जिसके बाद पुरुरवा ने शर्त बताने को कहा ! उर्वशी बोली मेरी पहली शर्त यह है कि मैं अपने साथ दो मेमनों को भी लाई हूँ !
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 जिसकी देखभाल तुम्हे करनी होगी !  दूसरी शर्त ये है कि तुम्हे राजमहल से बाहर रहना होगा और तीसरी शर्त ये है कि मैं तुम्हे निर्वस्त्र कभी न देखूं ! इनमे से अगर कोई भी शर्त खंडित होती है तो मैं उसी दिन वापिस स्वर्ग चली जाऊँगी ! उर्वशी की शर्तों को सुनकर पुरुरवा ने उन्हें तुरंत मंजूर कर लिया ! फिर दोनों का विवाह सम्पन्न हुआ ! दोनों ख़ुशी पूर्वक साथ रहने लगे ! दोनों एक दूसरे को बहुत प्यार करते ! उनकी चर्चा तीनों लोकों में होने लगी ! उधर अप्सरा उर्वशी के बिना इंद्रदेव को स्वर्ग लोक अधूरा लग रहा था ! दोनों के प्रेम की बातें सुनकर देवराज इंद्र से भी रहा नहीं गया ! उसने एक योजना बनाई और योजना के अनुसार एक रात को उन्होंने गंधर्वों को मेमनों को चोरी करने के लिए भेजा ! गंधर्वों ने चोरी करते हुए जानबूझकर आवाज की जिससे उर्वशी जग गयी ! उसने पुरुरवा से कहा - इधर आप निद्रा में मग्न है उधर गंधर्व मेरा मेमना चोरी कर गए ! ये सुन पुरुरवा तुरंत कक्ष से निकलकर मेमनों को बचाने के लिए दौड़ पड़े ! पर उसी समय इंद्रदेव ने बिजली कड़कायी जिसकी वजह से उजाला हो गया और उर्वशी ने राजा पुरुरवा को निर्वस्त्र देख लिया ! उसी क्षण उर्वशी अंतर्ध्यान हो गयी ! इसके बाद पुरुरवा ने उर्वशी की तलाश में सम्पूर्ण भूलोक छान मारा ! वह पर्वतों , घाटियों में भटकता रहा ! वह विक्षिप्त हो कभी-कभी वन की लताओं को उर्वशी समझकर आलिंगन कर लेता ! एक वर्ष पश्चात उर्वशी राजा पुरुरवा के पास आयी और उसे एक पुत्र सौंप गयी ! साथ ही उसने यह वचन भी दिया कि वो हर वर्ष के अंतिम दिन उनसे मिलने आएगी ! और इस प्रकार वर्ष के एक दिन ही उर्वशी और राजा पुरुरवा एक साथ होते थे ! 

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