कुम्हार की कहानी

 एक गांव में एक गरीब कुम्हार था । वह और उसकी पत्नी दोनों एक झोपड़ी में रहते थे ।उनकी शादी को कई वर्ष बीत चुके थे लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी । कुम्हार माता दुर्गा का बहुत बड़ा भक्त था । वह हर समय माता दुर्गा का नाम जपता रहता था । जब वह मिट्टी के बर्तन बनाता, तब भी वह माता दुर्गा का नाम जपता रहता और मस्ती से अपना काम करता रहता । जब कई साल बीत गए तब उनके घर मां दुर्गा की कृपा से एक पुत्र का जन्म हुआ । कुम्हार के घर में खुशियां छा गई । उन दोनों ने मां दुर्गा का बहुत-बहुत धन्यवाद किया । जब उनका पुत्र 1 वर्ष का था तो एक दिन की बात है कुम्हार मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए मिट्टी को पहले अपने पैरों तले रौंद रहा था  ताकि मिट्टी चिकनी हो जाए और बर्तन आसानी से बन जाए । वह आंखें बंद किए मां दुर्गा का नाम जप रहा था और मिट्टी रौंद रहा था । उसकी पत्नी खाना बना रही थी ।तभी अचानक उसका 1 वर्ष का बेटा खेलता – खेलता घुटनों के बल चलता हुआ उसके पास आया । कुम्हार ने अपनी आंखें बंद की हुई थी इसलिए उसे अपना पुत्र दिखाई नहीं दिया । वह मां दुर्गा के नाम के स्मरण में इतना खोया हुआ था  कि उसे अपने पुत्र के आने का आभास भी नहीं हुआ । उसका पुत्र उसके पास आता चला गया और वह धीरे-धीरे उसे मिट्टी में पैरों से  रौंदता चला गया ।  उसे अपने पुत्र के रोने का स्वर भी नहीं सुनाई दिया। तभी उसकी पत्नी खाना बनाकर जैसे ही बाहर आई तो उसने अपने घर में अपने पुत्र को नहीं देखा । तो वह बाहर अपने पुत्र को देखने आई । जब उसे उसका पुत्र बाहर दिखाई नहीं दिया । तो उसने अपने पति से पूछा । लेकिन उसका पति तो मां दुर्गा के ध्यान में मग्न था । उसे अपनी पत्नी की आवाज सुनाई नहीं दी । जब उसकी पत्नी का ध्यान कुम्हार के पैरों की तरफ गया जहां वह मिट्टी को रौंद रहा था तो उसे अपने बेटे के कपड़ों की कतरन दिखाई दी । कपड़ों को देखकर उसका मन घबराया  और वह बहुत जोर से चिल्लाई । उसके चिल्लाने की आवाज सुनकर कुम्हार का ध्यान टूटा और उसने पूछा तुम क्यों रो रही हो ?तब उसने कहा कि यह आपने क्या कर दिया ?अपने ही बेटे को मार दिया जब उसकी पत्नी ने मिट्टी में अपने हाथों को डालकर जैसे ही ऊपर उठाया तो उसका बेटा उसके हाथ में आ गया । वह मरा चुका था । मिट्टी में दब जाने के कारण उसकी मौत हो गई थी । वह बहुत जोर जोर से रो रही थी । कुम्हार यह सब देखकर घबरा गया और मन ही मन मां दुर्गा के नाम का जाप करने लगा । और ध्यान मग्न होकर बोला हे ! मां दुर्गा देने वाली भी तू ही है मां और लेने वाली भी तू ही है । अगर मेरा पुत्र मुझसे लेना ही था तो इस तरह ना लेती कि मेरे माथे पर कलंक ही लग गया। मेरा पुत्र मुझे वापस लौटा दो इसलिए नहीं कि मुझे अपने पुत्र से मोह है या मैं अपने पुत्र के बिना नहीं जी सकता बल्कि इसलिए कि कोई यह ना कहे कि मां दुर्गा की भक्ति करते समय इसने अपने पुत्र को मार डाला । मैं अपने पुत्र का हत्यारा नहीं बनना चाहता । मैं इस कलंक के साथ नहीं जी पाऊंगा । और कोई  आपके नाम पर उंगली ना उठा सके । उसने मन ही मन मां दुर्गा से प्रार्थना की कि तभी थोड़ी देर बाद एक चमत्कार हुआ । उसके मरे हुए बेटे में प्राण आ गए और वह अपनी मां की गोद में ही जोर जोर से रोने लगा । कुम्हार की पत्नी यह सब देखकर आश्चर्यचकित हो गई और अपने बेटे को गले से लगा लिया । कुम्हार ने यह सब देखा तो उसकी आंखो से आंसू बहने लगे और उसने मां का धन्यवाद किया । मां दुर्गा ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए और कहा कि मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत प्रसन्न हूं । मांगो तुम क्या चाहते हो ? कुछ वर मांगो । कुम्हार बोला मां मुझे कुछ नहीं चाहिए आपने मेरे माथे से यह कलंक हटा दिया । इससे बढ़कर मेरे लिए कुछ नहीं है और अगर आप मुझे कोई वर देना ही चाहती हैं तो मुझे यह वर दीजिए कि मैं सदा आपके नाम का सिमरन करता रहूं । मुझे आपकी भक्ति प्राप्त हो । तब मां दुर्गा ने कुम्हार को यही वरदान दिया और अंतर्ध्यान हो गई ।

 

तो  भक्तों , मां दुर्गा अपने भक्तों को कभी मुसीबत में नहीं डालती । जो भक्त मां दुर्गा का नाम सच्चे मन से जपते हैं मां दुर्गा उनके सारे कष्टों को हर लेती है


There was a poor potter in a village. He and his wife both lived in a hut. Many years had passed since their marriage but they had no children. The potter was a great devotee of Mother Durga. He used to chant the name of Mother Durga all the time. Even when he made earthen pots, he kept on chanting the name of Mother Durga and doing his work with fun. When many years passed, a son was born in his house by the grace of Mother Durga. There was happiness in the potter's house. Both of them thanked Maa Durga very much. When his son was 1 year old, it is a matter of one day that the potter was first trampling the clay under his feet to make the pottery so that the clay becomes smooth and the pot can be made easily. He was chanting the name of Maa Durga with his eyes closed and was trampling the soil. His wife was cooking. Then suddenly his 1-year-old son came to him walking on his knees while playing. The potter had closed his eyes so he could not see his son. He was so lost in the remembrance of the name of Maa Durga that he did not even realize the arrival of his son. His son kept coming to him and he slowly trampled him in the mud with his feet. He could not even hear the cry of his son. Then as soon as his wife came out after preparing food, she did not see her son in her house. So she came outside to see her son. When he did not see his son outside. So she asked her husband. But her husband was engrossed in the meditation of Mother Durga. He could not hear his wife's voice. When his wife's attention turned to the potter's feet where he was trampling the clay, she saw the shavings of her son's clothes. Seeing the clothes, her mind panicked and she cried very loudly. Hearing his shouting, the potter's attention broke and he asked why are you crying? Then he said that what have you done? Killed his own son when his wife put her hands in the soil and raised her as soon as she raised it. The son came into his hand. He was dead. He died due to being buried in the soil. She was crying very loudly. The potter was terrified seeing all this and started chanting the name of Maa Durga in his heart. And meditating, he said! You are also the giver of Maa Durga, you are the mother and you are also the taker. If my son had to take it from me, he would not have taken it in such a way that my forehead was tainted. Return my son to me not because I am infatuated with my son or I cannot live without my son, but because no one should say that he killed his son while worshiping Maa Durga. I don't want to be my son's killer. I can't live with this stigma. And no one can point a finger at your name. He prayed to Maa Durga in his heart that only after a while a miracle happened. His dead son came to life and he started crying loudly in his mother's lap. The potter's wife was surprised to see all this and hugged her son. When the potter saw all this, tears started flowing from his eyes and he thanked his mother. Maa Durga appeared to him and said that I am very happy with your devotion. Ask what do you want? Ask for something The potter said – Mother, I do not want anything, you removed this stigma from my forehead. There is nothing more for me than this and if you want to give me any boon, then give me this boon that I will always keep on singing your name. May I have your devotion. Then Mother Durga gave this boon to the potter and she became intrigued.


 


So devotees, Maa Durga never puts her devotees in trouble. Devotees who chant the name of Maa Durga with a sincere heart, Maa Durga takes away all their troubles.

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